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बेटियाँ ही नहीं ।

Anupama Arya

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज अस्पताल में एक औरत मिली,
        
                                                    
                            
उसने मुझे देखकर कहा—
लड़कियाँ बहुत कुछ करती हैं
अपने माता-पिता के लिए।

जब छोटी होती हैं
तो उनकी लाड़ली होती हैं,
उनके आगे-पीछे घूमती हैं,
और बड़ी होकर
घर की माँ बन जाती हैं।

उसकी बात अच्छी लगी,
क्योंकि कभी मेरी सोच भी यही थी।
फिर न जाने क्यों
मन ने धीरे से कहा—
क्या बेटे कम होते हैं?

वो भी तो एक घर की नींव में
धूप-छाँव की तरह खड़े होते हैं,
अपने हिस्से की जिम्मेदारियों का
चुपचाप बोझ ढोते हैं।

फर्क बस इतना है शायद,
लड़कियाँ अपना होना
थोड़ा ज्यादा जता देती हैं,
बेटे कई बार
अपने हिस्से का प्यार
चुपचाप निभा देते हैं।

उन्हें माँ की खामोशी
और पिता की आँखों के नीचे
पड़े काले धब्बे दिख जाते हैं,
महीने के हिसाब में
थोड़ी फिक्र
और थोड़ा ज्यादा प्यार
मिला देते हैं।

उनको पता होता है,
पापा कहेंगे नहीं,
पूछने पर बस इतना कहेंगे—
“सब ठीक है।”

अपनी मुस्कुराहट के पीछे
जाने कितनी बातें छुपा लेंगे।

माँ फोन पर आधी बात करेगी,
बाकी आधी-अधूरी बातों को
मेरी बातों में मिला देगी।

फिर बेटे को
घर की दीवारों से,
पड़ी हुई पुरानी चादर से,
घर में रखे सामान से
उनका हाल जानना पड़ेगा।

फिर तभी उधर से
डॉक्टर की आवाज़ आई,
पास खड़े लोगों का
शोर सुनाई दिया।

वो अब भी मुझे ऐसे देख रही थी,
जैसे उनके अनुभव
अभी कुछ और कहना चाहते हों।

पर अब मैं बहस में
नहीं पड़ना चाहती थी,
न यह साबित करना था
कि कौन ज्यादा करता है।

बस अपनी बदली हुई सोच के साथ
आगे बढ़ना चाहती थी।

अब वो मेरी तरफ़ मुड़ी
और मुस्कुराई,
मैं भी उनको छोड़कर
आगे बढ़ गई।
22 घंटे पहले
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