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अधूरे प्रेम के लिए ।

Anupama Arya

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आज पर्दा झाड़ते समय
        
                                                    
                            
वह दरवाज़े में जाकर अटक गया।

लगा कि कहीं ज़्यादा ज़ोर लगाएँगे,
तो गिर जाएगा।

उसे आहिस्ता, प्यार से सहलाया,
फिर कहीं वो जाकर निकल गया।

आज नीली चादर भी
बिस्तर पर उलझ गई थी,
दीवार पर लगी तस्वीर भी
अपनी जगह से भटक गई थी।

आज कुछ सही नहीं हो रहा था।

गैस पर चाय चढ़ाई,
वह जल गई।

सुबह से यही हो रहा था—
हाथ में ली हुई किताब का
पन्ना पलट रहा था।

आज माथे पर बिंदी लगाना भूल गई थी,
पूजा में भी
आरती की कुछ पंक्तियाँ भूल गई।

बैठक के कमरे में
आरामदायक कुर्सी पर बैठकर
लिखने को डायरी निकाली,
तो शब्द अटक गए।

जैसे उनको
लंबी छुट्टी पर जाना था—
पहाड़ों में,
बर्फ़ के बीच।

मैंने भी उन्हें रोका नहीं,
उन्हें जाने दिया।

जैसे वे कह रहे हों—
“अबकी बार लौटेंगे,
तो कुछ नए शब्दों के साथ आएँगे।”

अच्छा है न,
बाहर घूमकर आएँगे,
अपने नए दोस्तों के साथ।

मैं पौधों में पानी डाल रही थी,
कुछ पौधे सूख गए थे।

कुछ नए लाई थी
लगाने को—
हरा बगीचा
और उसमें रंग-बिरंगे फूल।

मुझे ख़ुशबू वाले फूल
बहुत पसंद हैं,
पर माँ लगाने नहीं देतीं।

कहती हैं,
ख़ुशबू के नीचे
साँप रहते हैं।

मैं उनकी इस बात को
कभी नहीं मानती।

तभी तो
मेरी ज़िद के दो-तीन फूल
अब भी वहाँ हैं।

वैसे ज़िद करना
अच्छा नहीं होता।

पर कभी-कभी
ज़िद करने से
आपके मन का हो जाता है।

मन से याद आया—
वह नीला सूट,
जिसमें सुनहरे मोती लगे थे।

बड़े चाव से खरीदा था मैंने।

उसकी सिलाई निकल गई थी,
आज फिर से
उसे सी लिया है।

हर तस्वीर में
तो वही सूट दिखता है,
जैसे वह तस्वीर ही
उस सूट की है।

बहन कह रही थी—
“अगर नहीं पहनना,
तो किसी को दे दो।”

फिर से एक चाय बनाई है,
पर अब कुर्सी
थोड़ी बदल गई है।

फिर से डायरी उठाई,
और उसके एक नए पन्ने पर
लिख दिया—
 
एक महीने पहले
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Manju Sharma

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