वो हर पल गुलजार गालियां, वो लालकिला,
वो शीशगंज गुरुद्वारा देखे,
वो दरीबे से आती घी की खुशबू ,
वो गालियां बल्लीमारान की ,
वो चौक वो फुव्वारे देखे,
अरसा बीत गया चाँदनी चौक का नजारा देखे
वो नई सड़क पर बिखरी दुकानें किताबों की,
वो गालियों में गुमशुदा जर्जर सी पड़ी हवेलियां नवाबों की,
वो कुल्हड़ का दूध, वो जलेबी वो रबड़ी मलाई,
वो गुलकंद भरा मीठा पान।
वो भगीरथ पैलेस की जगमग,
दुकानों में बिकता बिजली का सामान
वो खारी बाबली से उड़ती झरप मसालों की,
वो मेवों का बाजार, वो महक़ अतरंगी अचारों की
जब भी होते हैं वहाँ तो कुछ खाने का दिल करता है,
हो काम या न हो जाने का दिल करता है ।
वो गली परांठे वाली , वो ग़ालिब का मोहल्ला ,
वो चावड़ी बाजार हमारा देखे ,
अरसा बीत गया चाँदनी चौक का नजारा देख
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