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नासमझ संसार

Anubhav Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रैन गँवाई सोय बिन, दिवस न चेते अंध।
        
                                                    
                            
काम-काज सूझै नहीं, पड़ा मोह का बंध॥
हँसे तो दुनिया मुख कतरै, रोए धीरज खोय।
नासमझ इस संसार में, चाहत पूरी न होय॥
7 घंटे पहले
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