फिर वही भूख, फिर वही रोटी का सवाल
हाथ मलते लाचार मजदूर किसान
चुल्हे के पास बैठी खाली तवे को देखती
मां परेशान-हलकान
बेटे के हाथ में डिग्री
फिर भी नहीं कोई पहचान
दंगों के लपट में
जलते- सुलगते शहर
लाशों की फसल पर
सजती सियासत की दूकान
कहीं कोई हरकत नहीं
न कोई जुलूस-मसाल
किस - किस भेष में लोग
अवाम को लूट रहे हैं
है न! हमारी जम्हुरियत की
यह शानदार पहचान।
-लालचंद गुप्ता.....