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विनाश का विकास

Ansh Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नव युग के, नव कवि,
        
                                                    
                            
क्या तुम लिखना चाहोगे?
नदियों की सूखी साँसों पर,
क्या तुम लिखना चाहोगे?
कटते जंगल, रोते पर्वत,
क्या तुम उनकी व्यथा कहोगे?
पशु-पक्षियों की मौन पुकार को,
क्या तुम अपना स्वर दोगे?
यहाँ विकास के नाम पर
हर रोज़ विनाश सजाया जाता है,
धरती माँ के आँचल को
अपनों से ही जलाया जाता है।
मैं बोला—
लिखने को तो मैं लिख दूँगा,
लेकिन क्या कहना मेरा मानोगे?
इस प्रकृति को बचाने की ख़ातिर,
क्या तुम अपनी जान भी वारोगे?
मूर्ख लोग कितने हैं यहाँ,
जो विकास कहकर विनाश करते हैं।
और बुद्धिजीवियों का क्या कहना,
वो भी उनका ही समर्थन करते हैं।
कुछ की ज़ुबान पर ताले हैं,
कुछ की आँखों पर पर्दे हैं,
जिन्हें सच का दीप जलाना था,
वो अँधेरों से ही सहमे हैं।
सुना है, और देखा भी है,
सच के ख़िलाफ़ झूठ का मेला लगता है।
जो आवाज़ उठाता है,
वही सबसे पहले अकेला पड़ता है।
ख़िलाफ़ जाओ तो नज़रबंद,
फिर भी न झुको तो इल्ज़ाम मिलता है।
और जब सच बहुत ऊँचा उठ जाए,
तो जंग-ए-एलान का नाम मिलता है।
मैं भविष्य को सोच-सोच
अक्सर यूँ चिंतित होता हूँ,
ऐसा लगता है मानो
हर पल अंदर से खंडित होता हूँ।
लिखने को तो मैं लिख दूँगा,
पर क्या होगा लिखने से?
जब लोग ही साथ न देंगे,
तो क्या बदलेगा कहने से?
फिर भी कलम नहीं रुकती,
उम्मीद अभी भी ज़िंदा है।
एक चिंगारी ही काफ़ी होती है,
अगर इरादा बुलंद और ज़िंदा है।
अब तुम ही बतलाओ, 'अभ्र',
क्या सचमुच लिखना व्यर्थ होगा?
अगर एक भी दिल जाग उठा,
तो क्या इतना भी कम होगा?
लिखने को तो मैं लिखूँगा,
जब तक साँसों में रवानी होगी।
शायद मेरी एक पुकार से ही,
किसी नई सुबह की कहानी होगी।
~ अभ्र
3 घंटे पहले
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