"थक हार कर भी सफर जारी रखो।
तुम मुसाफिर हो रास्तों से यारी रखो।।
यहां हर रास्ता मंजिल को नही जाता।
तुम सही रास्तों की जानकारी रखो।।
सोने की चमक भाती है चंचल मन को।
कीमती सामान की एक अलमारी रखो।।
सबको अपना पक्ष सही लगता है यहां।
गर जिरह करो तो तालीम सारी रखो।।
घिरकर अपनों से भी वो अकेला रहा।
तुम साथ पाने की ना खुमारी रखो।।
भीड़ में कोई किसी की नही सुनता।
अगर बोलो तो लहजा जरा भारी रखो।।