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अपने इस दिल का ख़द-ओ-ख़ाल लिख रहा हूं मैं

Anmol Sinha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक ख़त का वादा (नज़्म)
        
                                                    
                            

तुझसे जो एक ख़त का वादा था
वो तुझे आज लिख रहा हूं मैं
वो एक किस्सा जो कभी आधा था
वो तुझे आज लिख रहा हूं मैं

तमाम उम्र मेरी तेरी आरज़ू में कटी
ज़िंदगी ये मेरी तेरी जुस्तजू में कटी
दिल में रह-रहकर कुछ ऐसे सवाल गुज़रे हैं
कि बाद तेरे कैसे माह-ओ-साल गुज़रे हैं
वो माह-ओ-साल तुझे आज लिख रहा हूं मैं
तुझसे जो एक ख़त का वादा था
वो तुझे आज लिख रहा हूं मैं

तेरे बिन दिल ही नहीं घर भी था खाली-खाली
तेरे बिन सूनी रही ईद, फीकी दीवाली
यूं तो सब कुछ ही था फिर भी रहा कम-कम सा
तेरे बग़ैर दिल का दीपक भी रहा मध्यम सा
काम तो सारे अपने समय में होते रहे
घर के दीवार-ओ-दर पर तेरे लिए रोते रहे
अपने माज़ी का तुझे हाल लिख रहा हूं मैं
तुझसे जो एक ख़त का वादा था
वो तुझे आज लिख रहा हूं मैं

ख़ुदा करे तू सलामत रहे, पुरनूर रहे
रहे तू पास में मेरे, या कि दूर रहे
तेरी ही राह तकती रहती हैं आँखें मेरी
हां तुझको पास बुलाती हैं ये बाहें मेरी
तेरी ही याद, तेरे ही ख़्याल में गुम है
ये मेरा दिल बस इसी मलाल में गुम है
इससे ज़्यादा हाल अपना सुनाऊँ क्या
तू आके देख ले अब और मैं बताऊं क्या
अपने इस दिल का ख़द-ओ-ख़ाल लिख रहा हूं मैं
तुझसे जो एक ख़त का वादा था
वो तुझे आज लिख रहा हूं मैं।
-अनमोल
2 घंटे पहले
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