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वो हर एक शय है बचपन के

Anmol Sinha

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अनकही कहानी (नज़्म)
        
                                                    
                            

ये मेरे ज़ीस्त की एक अनकही कहानी है
मगर मुझको तुझे आज ये सुनानी है

वो कहानी जिसे मैं सुना नहीं पाया
जिसे किसी को कभी भी बता नहीं पाया
जिसे मिला न सहारा कभी भी लफ़्ज़ों का
जिसे कोई भी पैराहन सजा नहीं पाया
जिसके बारे में कुछ भी ख़ास नहीं है शायद
ये किसी के दिल के पास नहीं है शायद
इस कहानी में न राजा है, न ही रानी है
बड़ी सादा, बड़ी मामूली ज़िंदगानी है
यहां एक दिल है जिसमें कई उमंगें हैं
रोज़ उभरती उनमें कई तरंगें हैं
इसमें एक ख़्वाब है जिसमें किसी का चेहरा है
मगर मायूसियों का हर कदम पे पहरा है
हां वही दिल जो धड़कता था किसी के लिए
बनके आवारा वो भटकता था किसी के लिए
अब वो घायल पड़ा हुआ है अधमरा सा है
कई दिनों से दर्द में वो डरा-डरा सा है
वो जो एक ख़्वाब था, वो भी बुझा-बुझा सा है
कई दिनों से वो आया नहीं है आंखों में
उसकी खुशबू भी नहीं है अब मेरी सांसों में

हैं इस कहानी में और भी कई किरदार
जो हैं शामिल होने के हकदार
वो एक गली है जिसमें हमारा बचपन खेला
हम साथ-साथ रहे, घूमे और साथ बढ़ते गए
कभी नज़दीक रहे और कभी लड़ते गए
वो पेड़ जिसके वो झूले हमें बुलाते हैं
पुराने किस्सों को याद हमें कराते हैं
वो नदी जिसके किनारे किए थे क़ौल-ओ-क़रार
अब वो शांत पड़ी है शायद करती हो हमारा इंतज़ार
वो गांव, वो मंज़र, वो मेले हैं
जाने-अनजाने ज़िंदगी के झमेले हैं

वो हर एक शय है बचपन के
जो हम छोड़ आए हैं
वो हर एक चीज़ यादों की
वो रिश्ते, वो नाते, वो कसमें, वो वादे,
जिन्हें हम तोड़ आए हैं
सुनानी है एक आख़िरी बार तुमको ज़ुबानी
हां वो हमारे बचपन की कहानी।
-अनमोल
4 घंटे पहले
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