मैं कहां तुम कहां
मैं कीचड़ के जल सा मलिन, तुम स्वच्छ नीला आसमां,
मैं कहां तुम कहां
तुम हो बाग का पुष्प जो प्रभु की मुरत पर अर्पण हुआ,
मैं हूं वन का पुष्प जो वन में खिलकर मुरझा गया
तुम हो पीपल का वृक्ष जो गर्मी में छांव दे
मैं हूं दुर्गम मार्ग का पथिक जो तेरी छांव को तरसे
पर- मैं चकोर सा चाहत वाला तुम शरदरूपी चन्द्रमा
मैं कहां तुम कहां,