बात अब चाहे गलत हो या सही?
मेरे लिए अब तुम किसी काम के नहीं।
यही कहा था न तुमने जब मिले थे,
वक्त ने उस दिन मेरे होंठ सिले थे।
कहना तो बहुत कुछ था तुम्हें,
पर न जाने क्यूं आंसू बहुत गिरे थे।
जब जमाने से अपनी नजरें चुराए मैं तुम्हेंं देख रहा था,
तुम बेदर्द लहजे में कह रहे थे खड़े होकर वही।
बात अब चाहे गलत हो या सही.....
पहली बार एक शख्स ने पूरी तरह तोड़ दिया,
मुकाम का पता नहीं रस्ते पर छोड़ दिया।
कुछ समझ नहीं आ रहा कहां जाऊं,
खता क्या थी मेरी जो सब ने मुंह मोड़ लिया।
हर एक पत्थर की रंगत बदली सी लगी,
जो जेहन में नासूर बनकर चुभती रही।
बात अच्छी है गलत हो या सही....
बहुत समय लग गया संभालने में,
भीड़ में खुद को तलाशने में।
भगवान और इंसान दोनों पत्थर के हैं,
सब की हकीकत जानने में।
आज मैं हूंं जहां तेरी वजह से,
मैंने वही बात आज उससे कहीं।
बात अच्छी है गलत हो या सही....
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