विज्ञापन

आम आदमी की आम जिंदगी

Ankit Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं भी सबका एक सुना सुनाया किस्सा हूँ,
        
                                                    
                            
जी, भीड़ वाली ही जिंदगी जी रहा मैं भी भीड़ का हिस्सा हूँ।

हां तो क्या हुआ कि मैं भी कभी-कभी जाम पी लेता हूँ,
अजी आम आदमी हूँ साहेब , आम जिंदगी मैं भी जी लेता हूँ।

माना,
मैंने माना कि नौकरी के बोझ के तले मैं जिंदगी हूँ जी रहा,
पर सफल क्यों न मानूूूं खुद को कुछ उम्मीदें तो पूरी कर रहा।

चलो माना कि सपने कुछ बड़े मैंने भी सोचे थे,
पर कैसे भूल जाता ये कि मेरे अपने कुछ उम्मीदों के साथ बैठे थे।

लंबा सफर है तय किया अभी बहुत सफर भी बाकी है,
न सपने देखना अभी छोड़ा मगर जितना पाया वो भी काफी है।



- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें। 
6 वर्ष पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Prasoon Saxena

973 कविताएं

View Profile