मैं भी सबका एक सुना सुनाया किस्सा हूँ,
जी, भीड़ वाली ही जिंदगी जी रहा मैं भी भीड़ का हिस्सा हूँ।
हां तो क्या हुआ कि मैं भी कभी-कभी जाम पी लेता हूँ,
अजी आम आदमी हूँ साहेब , आम जिंदगी मैं भी जी लेता हूँ।
माना,
मैंने माना कि नौकरी के बोझ के तले मैं जिंदगी हूँ जी रहा,
पर सफल क्यों न मानूूूं खुद को कुछ उम्मीदें तो पूरी कर रहा।
चलो माना कि सपने कुछ बड़े मैंने भी सोचे थे,
पर कैसे भूल जाता ये कि मेरे अपने कुछ उम्मीदों के साथ बैठे थे।
लंबा सफर है तय किया अभी बहुत सफर भी बाकी है,
न सपने देखना अभी छोड़ा मगर जितना पाया वो भी काफी है।
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