नवलपरासी बन कर प्राध्यापक मैं गया
1993 में मैं था इस शहर के लिए नया नया
पाल्ही कैंपस में मुझे मिला
काम अंग्रेजी पढ़ाने का
इसको आगे बढ़ाने का
था मैं बहुत जवान
और बहुत चरित्रवान
दुर्गा प्रसाद चौधरी मिले
मुझे खिले खिले
खूब सहयोग किए
मुझको खूब प्यार दिए
थे वे दमदार व्यक्ति
वे थे शानदार व्यक्ति
थे वे निडर, दमदार
उनमें थी शक्ति अपार
मुझे मान बहादुर चौधरी मिले
खिले खिले हिले मिले
पाल्ही कैंपस में मैं पढ़ाया
केंपस को मैं आगे बढ़ाया
नवलपरासी है नेपाल में
पता नहीं है यह अब किस हाल में?
है यह गंडक नदी के किनारे
लोग मिले मुझे प्यारे प्यारे
सीमा पर है ठूठीबारी
है धरती यह बड़ी प्यारी
मैं वहां नेपाली सीखा
नेपाली में कविता लिखा
खूब छपा, खूब लिखा
मैं था सुरक्षित नहीं वहां
मैं आया अपनी मही यहां
यहीं मैं सयपत्री पब्लिक स्कूल में पढ़ाया
साथ साथ पाल्ही कैंपस में मैं पढ़ाया
मैं देवरिया में पढ़ाया
मैं दौसा में नवोदय में पढ़ाया
तब मैं डुमरा, सीतामढ़ी आया
फिर मैं थावे आया
खूब पढ़ा, पढ़ाया
फिर मैं मुजफ्फरपुर आया
हूं मैं अभी पावन धरती गया में
गौतमबुद्ध के पावन छाया में
लिख रहा हूं जम कर
सीख रहा हूं जम कर
चमक रहा हूं बम बन कर
लिख रहा हूं आग
और तप त्याग
मुझे पढ़ लो
और आगे बढ़ लो
मेरी कविताओं में आग है
और बहुत तप त्याग है
क्या दूं मैं परिचय अपना
पूरा हो रहा है मेरा सारा सपना
धीरे धीरे
पढ़ो मुझे धीरे धीरे
घूमो फल्गु नदी के तीरे तीरे।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'