संस्थाएं सारी चलती हैं सबके सहयोग से
बनती हैं प्यारी सबके सहयोग से
न कि संयोग से
न जाति से
न पांति से
दौड़ती हैं ये जमात से
न कि किसी जात से
न कि केवल बात से
न कि जज्बात से
संस्थाएं श्रम से सींची जाती हैं
संस्थाएं सपनों से संजोई जाती हैं
सतत संघर्ष से सींची जाती हैं।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'