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गांव की सूखी रोटी

Ankit Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शहर में आए
        
                                                    
                            
आकर पछताए
सोच कर आए
संवरेगी जिंदगी
बदलेगी जिंदगी
पर शहर में क्यों आए?
धूल धक्कड़ खूब खाए
तब समझ में आया
मैं शहर में क्यों आया?
जब पग पग पर ठगाया
जब धक्का खूब खाया
तब गांव का रास्ता नजर आया
भागे भागे गांव आया
तब शांति पाया
अब कसम खाया
शहर नहीं जाऊंगा
भले भूखे सो जाऊंगा
कम से कम स्वच्छ पवन पानी पाऊंगा
सूखी रोटी खा कर भूख मिटाऊंगा
और स्वयं को स्वस्थ रख पाऊंगा
और शहर को बार बार अंगूठा दिखाऊंगा।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
3 घंटे पहले
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