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गांव की सूखी रोटी

                
                                                         
                            शहर में आए
                                                                 
                            
आकर पछताए
सोच कर आए
संवरेगी जिंदगी
बदलेगी जिंदगी
पर शहर में क्यों आए?
धूल धक्कड़ खूब खाए
तब समझ में आया
मैं शहर में क्यों आया?
जब पग पग पर ठगाया
जब धक्का खूब खाया
तब गांव का रास्ता नजर आया
भागे भागे गांव आया
तब शांति पाया
अब कसम खाया
शहर नहीं जाऊंगा
भले भूखे सो जाऊंगा
कम से कम स्वच्छ पवन पानी पाऊंगा
सूखी रोटी खा कर भूख मिटाऊंगा
और स्वयं को स्वस्थ रख पाऊंगा
और शहर को बार बार अंगूठा दिखाऊंगा।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'
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एक घंटा पहले

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