सुनिए,एक घटना
सीतामढ़ी से पटना
पटना से भेलौर
था वह कठिन दौर
मन में अनुराग लिए
साथ में ' अनुराग ' लिए
रेणु सिंह संग चल दिए
रेल में चढ़ लिए
आगे बढ़ लिए
सपने सुंदर गढ़ लिए
साले से एक.टी.एम. लिए
भेलौर पहुंच कर कमरा लिए
वहां दिन सारा बिततता था अस्पताल में
जानने को मन तड़पता था है अनुराग किस हाल में?
था मैं बुरे हाल में
था बड़ा बेहाल मैं
था नहीं पैसा साप्ताहिक बिल भरने के लिए
थी प्रकृति की मार
देव ने किया प्रहार
था बड़ा बेटा बीमार
सुख होता तो बांट लेते
पैसा होता तो बांट लेते
दुःख कैसे छांटें?
दुःख कैसे बांटें?
इधर उधर खाते थे
फटेहाल जिंदगी बिताते थे
एक शाम एक अनजान नंबर से फोन आया
अनजान आदमी वह नाम नहीं अपना बताया
वह बोला,"क्या बीस हजार चाहिए?"
मैं बोला,"हां, हां एक दम चाहिए"
पत्नी को नहीं बताया
गया मैं वहां,जहां वह बुलाया
पहले पता उसका मुझे भटकाया
पर अंततः सौ संख्या वाला घर मैं उसका पाया
बस से गया,बस से अस्पताल आया
अंततः बीस हजार रुपए मैं पाया
मन हर्षाया
तन हर्षाया
उसने नहीं फंसाया
पैसा काम आया
"अनुराग" को बचाया
पड़ी पर प्रकृति की छाया
है ईश्वर की सब माया
दिल्ली एम्स में मैं अनुराग को लाया
पत्नी बड़ी वीर निकली
एक तीक्ष्ण तीर निकली
थी वह कोमल कली
पर तूफान से लड़ने चली
लक्ष्मी बाई सी वह लड़ी
रही हर दुःख में वह खड़ी
पैसा मैं खूब लगाया
एम्स का चक्कर खूब लगाया
पर एम्स भी नहीं अनुराग को बचाया
मैं अपने प्यार को हार पाछ के डुमरा लाया
रात नौ बजे वह प्राण गंवाया
हाय! मैं उसे बचा नहीं पाया
हाय! मैं कुछ कर नहीं पाया
उसकी हर कराह में कहर था
यह देवों का कठोर कहर था
उसकी हर विलाप में करुण क्रंदन था
मेरे पास केवल एक सहारा बंदन था
सुन उसकी कराह, मैं भी खूब कराहा
पर दुःख नहीं उसका मैं कम कर पाया
अनुराग को बचा नहीं मैं पाया
हुआ नहीं वह जो मैं चाहा
पत्नी ने मातृ धर्म निबाहा
था मेरा बड़ा बेटा बड़ा बलिदानी
मैं रो रो कर कहा करूण कहानी
जय हो बम भोले दानी
देना नहीं ऐसा दुःख भले हो हमारी नादानी।
- सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज'