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यूं ही फिर से…

Anita Thukral

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            झोपड़ी से दर्द भरी
        
                                                    
                            
सिसकियों की आवाज़ें आया करती थीं,
वहाँ से चुपचाप निकल जाया करते थे लोग...

अब वहाँ न हवा है, न पानी है,
और न ही कोई शोर,
यूं ही घबरा जाते हैं लोग...

छोटी-सी तो थी झोपड़ी,
उसे यूं ही किला बना दिया,
कभी इधर से, तो कभी उधर,
उचक-उचक कर झाँकते हैं लोग...

जिस ओर से आती थीं आवाजें,
डर जाते हैं, और घबराकर
अजीब ही नाम रख देते हैं लोग...

झोपड़ी के चारों तरफ़
धीमे कदमों से,
संभलकर चलते हैं लोग...

मौत आसानी से हिसाब पूरा कर देती है,
ज़िंदगी भर उलझनों में
उलझे रहते हैं लोग...

सूख चुका था समुद्र आँखों में,
हवाओं के झोंकों से
फिर समुद्र भर देते हैं लोग...

देखो! अजब-गज़ब नज़ारा है—
पहले से ही अकेली थी,
डरकर यूं ही फिर से अकेला कर देते हैं लोग...
—अनीता 'निधि'
2 घंटे पहले
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