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रोटी हलक़ से नीचे नहीं होती

Anita Thukral

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वक़्त गुज़र जाने के बाद
        
                                                    
                            
कोई क़ीमत किसी की भी नहीं होती,
जिस तरह इंतज़ार के बाद
मिलने वाले की सूरत हसीं नहीं होती।

तक़दीर बनाने वाला तो एक ही था,
मगर किसी की भी तक़दीर किसी
दूसरी तक़दीर की शक्ल नहीं होती।

रोते हो दूसरों की थाली में ज़्यादा देखकर,
यहाँ किसी की भी रोटी हलक़ से नीचे नहीं होती।
—अनीता 'निधि'
एक महीने पहले
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