वक़्त गुज़र जाने के बाद
कोई क़ीमत किसी की भी नहीं होती,
जिस तरह इंतज़ार के बाद
मिलने वाले की सूरत हसीं नहीं होती।
तक़दीर बनाने वाला तो एक ही था,
मगर किसी की भी तक़दीर किसी
दूसरी तक़दीर की शक्ल नहीं होती।
रोते हो दूसरों की थाली में ज़्यादा देखकर,
यहाँ किसी की भी रोटी हलक़ से नीचे नहीं होती।
—अनीता 'निधि'
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