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पत्थर हु दीया नहीं जो हवाओं से डर जाऊँगा

Anita Srivastava

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            गुज़रा वक़्त हु वापस कैसे आऊंगा
        
                                                    
                            
सुखी हुई शाख हूँ हवाओ से बिखर जाऊँगा

मुझको अपना गम देदे मेहेरबानी नवाज़िश
इन्हे हमसफ़र बना कर सफर से गुज़र जाऊँगा

इतनी नफरते न मिला हवाओ में
घूट-घूट कर ही सही मगर मर जाऊँगा

अपने दामन में पनाह देदे तो सुकून मिले
दर-बदर भटकता हूँ जाने किधर जाऊँगा

बेनूर ज़िन्दगी खिज़ाओ सी काया मेरी
जो तू बन जाए आइना तो संवर जाऊँगा

इतनी गैरना बातें न कर कि अच्छा लगता नहीं
देखना एक दिन तेरे अश्को में नज़र आऊंगा

मैं तेरा हाले-बयां तेरा अफ़साना हु
सच कहता हु तेरे दिल में उतर जाऊँगा

मेरी बर्बादी कि ख्वाइश रखते हैं ज़माने वाले
पत्थर हु दीया नहीं जो हवाओं से डर जाऊँगा
एक घंटा पहले
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Shivam Awasthi

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