गुज़रा वक़्त हु वापस कैसे आऊंगा
सुखी हुई शाख हूँ हवाओ से बिखर जाऊँगा
मुझको अपना गम देदे मेहेरबानी नवाज़िश
इन्हे हमसफ़र बना कर सफर से गुज़र जाऊँगा
इतनी नफरते न मिला हवाओ में
घूट-घूट कर ही सही मगर मर जाऊँगा
अपने दामन में पनाह देदे तो सुकून मिले
दर-बदर भटकता हूँ जाने किधर जाऊँगा
बेनूर ज़िन्दगी खिज़ाओ सी काया मेरी
जो तू बन जाए आइना तो संवर जाऊँगा
इतनी गैरना बातें न कर कि अच्छा लगता नहीं
देखना एक दिन तेरे अश्को में नज़र आऊंगा
मैं तेरा हाले-बयां तेरा अफ़साना हु
सच कहता हु तेरे दिल में उतर जाऊँगा
मेरी बर्बादी कि ख्वाइश रखते हैं ज़माने वाले
पत्थर हु दीया नहीं जो हवाओं से डर जाऊँगा
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