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पत्थर हु दीया नहीं जो हवाओं से डर जाऊँगा

                
                                                         
                            गुज़रा वक़्त हु वापस कैसे आऊंगा
                                                                 
                            
सुखी हुई शाख हूँ हवाओ से बिखर जाऊँगा

मुझको अपना गम देदे मेहेरबानी नवाज़िश
इन्हे हमसफ़र बना कर सफर से गुज़र जाऊँगा

इतनी नफरते न मिला हवाओ में
घूट-घूट कर ही सही मगर मर जाऊँगा

अपने दामन में पनाह देदे तो सुकून मिले
दर-बदर भटकता हूँ जाने किधर जाऊँगा

बेनूर ज़िन्दगी खिज़ाओ सी काया मेरी
जो तू बन जाए आइना तो संवर जाऊँगा

इतनी गैरना बातें न कर कि अच्छा लगता नहीं
देखना एक दिन तेरे अश्को में नज़र आऊंगा

मैं तेरा हाले-बयां तेरा अफ़साना हु
सच कहता हु तेरे दिल में उतर जाऊँगा

मेरी बर्बादी कि ख्वाइश रखते हैं ज़माने वाले
पत्थर हु दीया नहीं जो हवाओं से डर जाऊँगा
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36 मिनट पहले

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