पुराने समय की बात है प्यारी,
मां रखती थी व्रत अति न्यारी।
बेटे की आयु लंबी हो जाए,
सुख-समृद्धि घर में समाए।
सुबह से जल भी न पिया करती,
ममता में लीन जिया करती।
गोबर से लीपा आँगन सारा,
रखा चौक पूजन का प्यारा।
सूरज ढले जब दीप जलाए,
मन में मां संकल्प निभाए।
धूप अगरबत्ती गंध सुवास,
सुनती कथा हृदय में आस।
अब बदल गया है समय हमारा,
ममता का रूप नहीं है न्यारा।
अब मां रखती है व्रत सुहाना,
सब बच्चों का हो मंगल गाना।
न बेटा न बेटी का भेद रहे,
सब पर ममता के मेघ बहे।
सबके जीवन में उजियारा,
यही होई का व्रत प्यारा।
अनीता सोलंकी...