विज्ञापन

झाँसी का किला

Anita Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            झाँसी के किले के झरोखों से झाँकते हुए
        
                                                    
                            
ये एहसास हुआ कि कभी इन झरोखों से
झाँका होगा रानी झाँसी ने।
प्यार से निहारा होगा अपनी प्रजा को
तो कभी गुस्से में अँग्रेजों को ललकारा होगा।
इस इमारत की हर दीवार ने देखा होगा
सरेआम होते कत्लों को,
इसकी हर ईंट पर लगा किसी अपने का खून होगा।
इस इमारत की हर ईंट की अपनी एक दांस्ता होगी,
क्योंकि हर घटना को देखने का इनका
एक अलग नजरिया होगा।
कभी देखा होगा इन्होंनें किसी अपने के विश्वासघात को,
तो कभी किसी पराए को रानी का अपना खास बनते देखा होगा।
छूते ही इस इमारत की मिट्टी को सर झुक जाता है सम्मान से
क्योंकि इस मिट्टी को कभी स्वराज की खातिर
हमारे पूर्वजों ने अपने खून से सींचा होगा।
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Nathuram Kaswan

8702 कविताएं

View Profile

Manoj Kumar

428 कविताएं

View Profile