झाँसी के किले के झरोखों से झाँकते हुए
ये एहसास हुआ कि कभी इन झरोखों से
झाँका होगा रानी झाँसी ने।
प्यार से निहारा होगा अपनी प्रजा को
तो कभी गुस्से में अँग्रेजों को ललकारा होगा।
इस इमारत की हर दीवार ने देखा होगा
सरेआम होते कत्लों को,
इसकी हर ईंट पर लगा किसी अपने का खून होगा।
इस इमारत की हर ईंट की अपनी एक दांस्ता होगी,
क्योंकि हर घटना को देखने का इनका
एक अलग नजरिया होगा।
कभी देखा होगा इन्होंनें किसी अपने के विश्वासघात को,
तो कभी किसी पराए को रानी का अपना खास बनते देखा होगा।
छूते ही इस इमारत की मिट्टी को सर झुक जाता है सम्मान से
क्योंकि इस मिट्टी को कभी स्वराज की खातिर
हमारे पूर्वजों ने अपने खून से सींचा होगा।
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