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तुम्हारे आने के बाद

Anita Chaturvedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तुम्हारे आने के बाद
        
                                                    
                            

जब भीतर का आकाश
लगातार बरसने से थक गया था,
और खिड़की पर टँगी धूप भी
कमरे तक आने से डरती थी,

तब तुम आईं—
जैसे किसी बंद किताब के बीच
अचानक मिल जाए
एक सूखा हुआ फूल,
जिसमें मौसम अब भी जीवित हो।

मैंने तुम्हें देखा
तो लगा—
हर प्रतीक्षा व्यर्थ नहीं जाती,
कुछ रास्ते
देर से खुलते हैं
मगर सही जगह ले जाते हैं।

उन दिनों
मेरे शब्दों में कोई गंध नहीं थी,
वाक्य चलते थे
पर पहुँचते कहीं नहीं थे,
और चुप्पी
मेरे कमरे की सबसे पुरानी चीज़ हो गई थी।

तुमने कुछ कहा नहीं,
बस थोड़ी देर
मेरे पास बैठीं—

और जाने कैसे
मेरी चुप्पी ने
अपना अर्थ पा लिया।

तुम्हारा होना
किसी उत्सव जैसा नहीं था,
वह तो
धीरे-धीरे खुलती हुई
सुबह था—

जिसका पता
सूरज निकलने से पहले
सिर्फ़ मन को चलता है।

मैंने जाना,
सहारा हमेशा
किसी हाथ का नाम नहीं होता,
कभी-कभी
किसी का होना ही
डूबते मन के लिए
किनारा बन जाता है।

तुम आईं
तो मेरी थकी हुई शामों ने
फिर से रंग पहचानना सीखा,
और मेरी आँखों ने
बिना किसी कारण
मुस्कुराना।

अब भी
जीवन वैसा ही है—
उलझनों से भरा,
कुछ अधूरे रास्ते,
कुछ अनकहे प्रश्न,
कुछ पुराने दुःख।

लेकिन फर्क इतना है—

अब जब अँधेरा बढ़ता है,
मुझे अँधेरे से डर नहीं लगता।

क्योंकि मुझे मालूम है,
किसी मोड़ पर
एक आत्मीय आवाज़
मेरा नाम लेकर
मुझे पुकार रही होगी।

और शायद
प्रेम का अर्थ भी यही है—

किसी का
हमारी ज़िंदगी में आकर
सब कुछ बदल देना नहीं,

बल्कि
उसी जीवन में
हमें फिर से
जीने का कारण दे देना।
-अनिता चतुर्वेदी 'मनस्वरा'
 
एक घंटा पहले
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