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थोड़ा और....

Anita Chaturvedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            थोड़ा और....
        
                                                    
                            

बस थोड़ा और—
यही तो कहा था
मन ने
हर मोड़ पर।

थोड़ा और धन,
थोड़ी और पहचान,
थोड़ी और प्रशंसा,
थोड़ा और सम्मान...

और इसी
"थोड़ा और"
की अंतहीन सीढ़ियाँ
चढ़ते-चढ़ते
हम भूल गए—

कि संतोष
किस मंज़िल का नाम था।

हमने
सूरज को भी
हथेली में बाँध लेना चाहा,

नदियों से कहा—
थोड़ा और बहो,

पेड़ों से कहा—
थोड़ा और फलो,

समय से कहा—
थोड़ा और ठहरो।

पर समय
कभी नहीं ठहरा,

नदी
कभी नहीं थकी,

सूरज
कभी किसी की
मुट्ठी में नहीं आया।

बेचैनी
दरअसल अभाव से नहीं,
अतृप्ति से
जन्म लेती है।

जिस दिन
"थोड़ा और"
की जगह
"इतना ही पर्याप्त है"
मन में उग आएगा,

उस दिन
जीवन
उपलब्धियों से नहीं,
अनुभूतियों से
भरा होगा।

और तब
हम समझेंगे—

सुख
"थोड़ा और"
पाने में नहीं,

जो है
उसे
पूरे मन से
जी लेने में है।
-अनिता चतुर्वेदी
2 महीने पहले
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