आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

थोड़ा और....

                
                                                         
                            थोड़ा और....
                                                                 
                            

बस थोड़ा और—
यही तो कहा था
मन ने
हर मोड़ पर।

थोड़ा और धन,
थोड़ी और पहचान,
थोड़ी और प्रशंसा,
थोड़ा और सम्मान...

और इसी
"थोड़ा और"
की अंतहीन सीढ़ियाँ
चढ़ते-चढ़ते
हम भूल गए—

कि संतोष
किस मंज़िल का नाम था।

हमने
सूरज को भी
हथेली में बाँध लेना चाहा,

नदियों से कहा—
थोड़ा और बहो,

पेड़ों से कहा—
थोड़ा और फलो,

समय से कहा—
थोड़ा और ठहरो।

पर समय
कभी नहीं ठहरा,

नदी
कभी नहीं थकी,

सूरज
कभी किसी की
मुट्ठी में नहीं आया।

बेचैनी
दरअसल अभाव से नहीं,
अतृप्ति से
जन्म लेती है।

जिस दिन
"थोड़ा और"
की जगह
"इतना ही पर्याप्त है"
मन में उग आएगा,

उस दिन
जीवन
उपलब्धियों से नहीं,
अनुभूतियों से
भरा होगा।

और तब
हम समझेंगे—

सुख
"थोड़ा और"
पाने में नहीं,

जो है
उसे
पूरे मन से
जी लेने में है।
-अनिता चतुर्वेदी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर