संसार में रहकर आध्यात्म~
संसार छोड़कर वन में जाना,
यह साधना नहीं केवल,
भीड़ के बीच स्वयं को पाना—
यही साधना है निर्मल।
मोह-माया के बीच रहकर
मन को निर्मल रखना,
सुख आए तो अहं न करना,
दुःख आए तो न बिखरना।
रिश्तों की हर जिम्मेदारी में
प्रेम का दीप जलाना,
अपने हिस्से के कर्म निभाकर
फल की चाह भुलाना।
हाथों में हों सांसारिक दायित्व,
हृदय में प्रभु का वास रहे,
होठों पर मधुर वचन सजे हों,
मन में करुणा का प्रकाश रहे।
मंदिर की घंटी से बढ़कर
किसी दुखी का दर्द समझना,
पूजा से बढ़कर भूखे को
अपने हाथों से अन्न परोसना।
जिसने अपने भीतर झाँक लिया,
उसने ईश्वर को पा लिया,
जिसने हर प्राणी में प्रभु देखा,
उसने जीवन सफल बना लिया।
वैराग्य वस्त्रों में नहीं होता,
न माथे की रेखाओं में,
वैराग्य तो तब खिलता है
जब आसक्ति हो भावनाओं में।
संसार के भीतर रहकर भी
यदि मन निर्मल रह पाए,
कर्तव्य निभाते-निभाते भी
यदि आत्मा मुस्काए—
तो समझो साधना सफल हुई,
जीवन बन गया उपासना,
संसार में रहकर आध्यात्म जीना—
यही तो है सच्ची महानता।
-अनिता चतुर्वेदी ‘मनस्वरा’