नील गगन की नीलिमा में,
कौन सुधा बरसाता है?
अरुण प्रभा के स्वर्णिम कर से,
कौन धरा सहलाता है?
शीतल मंद सुगंधित पवन,
कान में कुछ कह जाती,
पुष्प-पंखुरी पर ओस बनकर,
भोर स्वयं मुस्काती।
हरित तृणों की कोमल चादर,
धरती ने जब ओढ़ी,
वन-उपवन में मधु-गंधों ने,
मौन वीणिका छेड़ी।
कुंज-कुंज में कोयल कूके,
मधुरिम राग सुनाए,
पीत पल्लव की थिरकन पर,
भ्रमर गीत दोहराए।
कल-कल छल-छल करती सरिता,
पर्वत से उतर आती,
अपने निर्मल नीर से जैसे,
जीवन-प्यास बुझाती।
शैल-शिखर पर हिम की चादर,
धवल मुकुट-सी सोहे,
देख उसे नभ का नीलापन,
और अधिक निर्मल होवे।
मेघ घिरें जब श्यामल होकर,
दामिनि हँसती जाए,
बूँद-बूँद बन अमृत बरसे,
धरती तृप्ति मनाए।
माटी की सौंधी गंध उठे जब,
पहली वर्षा आए,
जाने कितने भूले बचपन,
मन के द्वार खटखटाए।
संध्या के सिंदूरी आँचल में,
दिन जब धीरे ढलता,
क्षितिज सुनहरी रेखा खींचे,
सूरज धीरे गलता।
रजनी के निस्तब्ध गगन में,
चंद्र सुधा बरसाता,
टिमटिम करते तारक-दल में,
जग कोई स्वप्न सजाता।
पत्तों की सरसर ध्वनि में,
ऋचाओं-सी गहराई,
झरनों की झंकारों में है,
सृष्टि-संगीत समाई।
फूलों ने मुस्कान बाँटकर,
जीवन-रीति सिखाई,
काँटों ने भी साथ निभाकर,
सहनशीलता बतलाई।
पतझर ने यह बात बताई—
कुछ खोना भी सुंदर है,
वसंत ने फिर आकर समझाया—
हर अंत नहीं अंतिम है।
प्रकृति न केवल रूप सलोना,
यह जीवन का सार है,
इसके कण-कण में सृष्टिकर्ता,
इसका अनुपम प्यार है।
इसके आँचल में जो बैठा,
वह खुद से मिल जाता,
मौन प्रकृति की भाषा सुनकर,
मन निर्मल हो जाता।
आओ इसके वृक्ष बचाएँ,
नदियों का सम्मान करें,
माटी, मेघ, पवन, वन, पर्वत—
सबका हम गुणगान करें।
जब तक धरती हरी रहेगी,
तब तक गीत रहेंगे,
प्रकृति रहेगी जब तक जग में,
हम भी प्रीत रहेंगे।