मेरी बेटी —
बेटी केवल नाम नहीं है,
बेटी मन का मान है,
सूने-सूने जीवन में वह
जैसे कोई मुस्कान है।
नन्हीं उँगली थामे मेरी,
जब तुम घर में आई थीं,
साथ तुम्हारे जाने कितनी
खुशियाँ संग ले आई थीं।
तेरी पहली किलकारी ने
घर-आँगन महकाया था,
तेरी छोटी-सी मुस्कान ने
जीवन मेरा सजाया था।
कभी गुड़िया, कभी सहेली,
कभी बनी मेरी माँ,
तेरे संग ही हँसते-हँसते
बीता मेरा हर एक समाँ।
तेरे नन्हे पाँवों ने जब
घर में कदम बढ़ाए थे,
उन पगचिह्नों में मैंने तो
अपने सपने पाए थे।
समय पंख लगाकर उड़ता,
बचपन पीछे छूट गया,
देखते-देखते मेरी बेटी
जाने कब बड़ी हो गई।
आज तुम्हारे अपने सपने,
अपनी राह, अपनी उड़ान,
माँ की आँखों में अब भी
बसा हुआ है तेरा बचपन।
लोग कहें बेटी पराई,
माँ यह कैसे मान सके?
जिसको हृदय में पाल लिया हो,
वह कैसे अनजान रहे?
दूर भले ही हो जाओ तुम,
मन से दूर न होना,
जीवन की हर कठिन घड़ी में
माँ को याद कर लेना।
तुम्हारी राहों में बेटी,
हर मौसम मधुमास रहे,
जिस घर जाओ, उस आँगन में
सुख का सदा निवास रहे।
तुम सपनों को पंख लगाना,
अपनी पहचान बनाना,
किसी की छाया बनकर
अपना अस्तित्व न खोना।
और अगर कभी थक जाओ तुम,
मन में कोई पीड़ा हो,
दुनिया से कुछ कह न सको तो
माँ से कह देना—
माँ अब भी वहीं खड़ी है,
जहाँ से तुमने चलना सीखा था।
बेटी, तुम केवल बेटी नहीं,
मेरी साँसों का विस्तार हो,
मेरी हर प्रार्थना का अर्थ,
मेरे जीवन का प्यार हो।
आज तुम्हारे इस दिवस पर
बस इतनी-सी बात कहूँ—
तुम जहाँ रहो, खुश रहना,
मैं हर पल तुम्हारे साथ रहूँ।
- अनिता चतुर्वेदी 'मनस्वरा'