विज्ञापन

मेले में- वो पुरानी कठपुतली के खेल की यादें

Anita Chaturvedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मेले में — वो पुरानी कठपुतली के खेल की यादें
        
                                                    
                            

मेले में फिर आज सजे हैं,
रंग-बिरंगे छोटे-छोटे संसार,
झूले, गुब्बारे, चूड़ी की खनक,
और मिट्टी की सौंधी-सी बहार।

भीड़ के उस शोर में जाने,
कानों में कुछ बोल पड़ा,
कहीं दूर से ढोलक बाजी,
मन बचपन की ओर चला।

एक कोने में वही पुराना,
कठपुतली का खेल सजा था,
लकड़ी की छोटी-सी गुड़िया में
जाने कितने जीवन बसा था।

डोर हिली तो राजा नाचा,
रानी ने घूँघट सरकाया,
विदूषक ने हँसा-हँसाकर
सारा मेला गुदगुदाया।

हम बच्चों की आँखों में तब
एक अलग ही दुनिया होती,
काठ की गुड़िया जीवित लगती,
हर कहानी अपनी होती।

न मोबाइल था, न स्क्रीन कोई,
न आभासी रंगों का संसार,
कुछ पल का वह सादा जादू
कर देता था मन को गुलज़ार।

आज मेले तो बहुत सजते हैं,
पर वह बचपन कहाँ से लाएँ?
कठपुतली की डोरें ढूँढ़ें,
या अपनी यादों में जाएँ?

समय की डोर खींचता रहता,
पात्र बदलते जाते हैं,
पर मेले की उन गलियों में
बचपन अब भी मुस्काते हैं।

कभी मिले जो वही कठपुतली,
तो ठहरूँगी पल दो पल,
शायद डोर पकड़कर फिर से
बचपन नाचे मेरे संग चल।
-अनिता चतुर्वेदी 'मनस्वरा'
21 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all