कई सवाल मन में…
क्यों कुछ रिश्ते
बिना किसी आहट के
दिल के इतने करीब आ जाते हैं,
और कुछ अपने होकर भी
मन की देहरी पर
अजनबी-से ठहर जाते हैं?
क्यों हम
हर किसी के चेहरे पर
अपनी-सी सच्चाई खोजते हैं,
और जब कोई छल जाता है
तो दोष उसे नहीं,
खुद को देते हैं?
क्यों कुछ शब्द
कहे बिना भी समझ आ जाते हैं,
और कभी-कभी
हजारों शब्दों के बीच
एक मन
अनकहा ही रह जाता है?
क्यों अपेक्षाएँ
रिश्तों में चुपके से घर बना लेती हैं,
और फिर उन्हीं की आहट से
मन बार-बार टूटता है?
क्यों हम
दूसरों के आँसू पढ़ लेते हैं,
पर अपनी आँखों की नमी
सबसे छिपाते हैं?
क्यों समय
सब कुछ बदल देता है—
चेहरे, रिश्ते, रास्ते,
बस कुछ स्मृतियाँ
वहीं की वहीं रह जाती हैं?
क्यों किसी की अनुपस्थिति
उसकी मौजूदगी से भी अधिक
महसूस होती है,
और कोई पास होकर भी
दिल से बहुत दूर होता है?
शायद…
हर सवाल का उत्तर
शब्दों में नहीं होता।
कुछ प्रश्न
समय की हथेली पर रखे
चुपचाप उत्तर की प्रतीक्षा करते हैं,
और कुछ का उत्तर
जीवन स्वयं बनकर
हमारे सामने आता है।
अब सवालों से डरती नहीं हूँ,
उन्हें मन में रखती हूँ—
क्योंकि जाना है मैंने,
हर सवाल का उत्तर मिलना ज़रूरी नहीं,
कुछ सवालों के साथ जीना भी
एक खूबसूरत अनुभव है।
- अनिता चतुर्वेदी 'मनस्वरा'