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हद से बेहद

Anita Chaturvedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हद से बेहद तक~
        
                                                    
                            

कुछ रिश्ते
हद में रहकर भी
उम्र की आख़िरी साँस तक
साथ निभा जाते हैं,
और कुछ अपने होकर भी
दिल की चौखट पर
अजनबी-से ठहर जाते हैं।

किसी की बातें
शाम की धूप-सी होती हैं—
क्षण भर छूती हैं,
मन पर सुनहरी आभा छोड़ती हैं
और चुपचाप ढल जाती हैं।

मगर किसी का मौन—
रात के उस आकाश-सा,
जिसमें कोई शब्द नहीं,
फिर भी
अनगिनत अर्थ
टिमटिमाते रहते हैं।

कुछ लोग
कहकर भी नहीं कहते,
कुछ बिना कहे
मन की तहों में
बहुत दूर तक उतर जाते हैं।

प्रेम भी
कितना विचित्र व्याकरण है—
हद में रहे
तो संबंध कहलाता है,
और हदें मिटा दे
तो वही
इबादत बन जाता है।

कभी एक नज़र
वह कह जाती है
जिसे कहने में
उम्र बीत जाए,
कभी एक स्पर्श
सारी दूरियों के बीच
पुल बन जाता है।

अजीब है यह चाहत भी—
दूरी थोड़ी बढ़ती है
तो स्मृति
और पास चली आती है;
राहें अलग होती हैं,
पर किसी की परछाईं
हर मोड़ पर
साथ चलती है।

हमने भी चाहा था
कुछ रिश्तों को
नाम की हद में रखना,
दिल को समझाया था—
“बस इतना ही…”
मगर दिल
कहाँ किसी तर्क का
ऋणी होता है!

कुछ लोग
मौसम के बादलों की तरह
ज़िंदगी में आते हैं—
थोड़ी देर ठहरते हैं,
कुछ बूँदें बरसाते हैं
और चले जाते हैं;
मगर उनकी बारिश
भीतर कहीं
बहुत देर तक
मिट्टी की गंध बनी रहती है।

शायद प्रेम
पाना नहीं,
किसी के होने का
वह अदृश्य विश्वास है
जो दूरी में भी
टूटता नहीं—
जैसे अँधेरे में
दीपक का होना
दिखाई न दे,
पर उजाला
उसकी गवाही देता रहे।

तभी तो
हर प्रेम को
नाम देना आवश्यक नहीं,
हर रिश्ते को
सीमा में बाँधना भी नहीं।

कुछ संबंध
शब्दों से पहले जन्म लेते हैं
और शब्दों के बाद भी
जीते रहते हैं।

कुछ एहसास
कहे नहीं जाते—
बस मन की किसी
निर्जन तह में
धीरे-धीरे
जीए जाते हैं।

क्योंकि जो
दिल में #बेहद उतर जाए,
उसे शब्दों की #हद में
कैसे बाँधा जाए—

कुछ प्रेम
रिश्ते नहीं होते,
वे मन की वह रोशनी होते हैं
जिसका कोई नाम नहीं,
कोई सीमा नहीं—
बस एक अनंत होना होता है।

 
एक महीने पहले
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