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डाली से टूटी हुई एक पत्ती,

Anita Chaturvedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक पत्ती
        
                                                    
                            

डाली से टूटी हुई एक पत्ती,
हवा के संग उड़ चली थी कहीं,
पीछे मुड़कर वृक्ष को देखती,
बोली—“मेरा ठिकाना अब है ही नहीं।”

कितने मौसम यहीं मैंने देखे,
धूप सहती रही, वर्षा पी,
कभी कोमल कोंपल बनकर हँसी,
कभी पतझर में चुपचाप जी।

आज क्यों छूट गया वह आँगन,
जिसमें बचपन-सा बीता समय?
क्या यही अंत है मेरी यात्रा का,
क्या यहीं रुक जाएगा मेरा क्रम?

हवा उसे दूर लेती गई,
राह में कितने प्रदेश मिले,
कहीं धूल मिली, कहीं ओस मिली,
कहीं पथ के किनारे स्नेह मिले।

एक दिन वह जा गिरी वहाँ,
जहाँ मिट्टी में नमी थी अभी,
उसने चुपचाप स्वयं को सौंप दिया,
जैसे कोई प्रार्थना हो नयी।

कुछ दिन बीते—मिट्टी मुस्काई,
उसकी कोख में हलचल हुई,
एक नन्ही-सी हरियाली निकली,
और धरती फिर से उजली हुई।

पत्ती ने तब जाना मन ही मन—
छूटना केवल बिछड़ना नहीं,
जिसे अंत समझकर रोते हैं हम,
वह किसी आरंभ से कम नहीं।

घर से दूर हुई थी जो पत्ती,
वही बन गई नई छाँव कहीं,
जीवन अपना रूप बदलता है,
मृत्यु भी शायद अंत नहीं।

जो कुछ छूटे, उसे रोकर मत देखो,
यात्रा का अर्थ समझना सीखो;
हर विदा में छिपा हुआ कल है,
टूटो नहीं—फिर से उगना सीखो।

 
एक महीने पहले
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