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बादरौ — विरहिणी की आस

Anita Chaturvedi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            घन घोर घिरे गगन में,
        
                                                    
                            
दामिनि दमकि उठी चहुँ ओर।
श्याम घटा की छाँह निहारी,
नैनन जागी पिय की डोर॥

काहे रे बादर! इत-उत डोलत,
काहे गरजत बारंबार?
जाइ कहो मोरे साँवरे से—
बिरहन बैठी तजि सिंगार॥

अँखियन अंजन सूख गयो है,
अधरन रूठी मधुर मुसकान।
सेज सजी, पर सेज विरानी,
पिय बिन सूना सारा धाम॥

कुंतल-जाल-सी घनघटा,
छाई नील गगन के छोर।
दामिनि-सी पिय-सुधि चमकै,
हिय में उठै प्रेम की हिलोर॥

मोर-पपीहा बोलत बन में,
कोयल कूकत आम्र-कुंज।
बूँदन की झंकार सुनत ही,
धड़क उठत विरही उर-कुंज॥

कहती—“बादर! दूत बनो तुम,
मेरी अरज सुनायो जाय।
कहियो श्याम बिना यह सावन,
आँखिन नीर बहायो जाय॥”

“कहियो—बिन दर्शन मोहन के,
फीकी लागै फाग-फुहार।
बादर बरसे लाख घड़ी पर,
सूना मन को कौन उबार?”

घन गरजा, नभ दामिनि हँसी,
बरसी बूँदन की झड़ी।
बिरहन के नयना भी बरसे,
याद पिया की और गहरी॥

श्याम घटा जब छाई अँगना,
लगी उसे श्यामल छवि भाय।
बादर में ही पिय को देखा,
बादर में ही पिय मुसकाय॥

बादर! तू धन्य भयो रे,
तूने विरह बढ़ायो आज।
पिय की सुधि जो देत हिय में,
वह भी तो है प्रेम-सुहाग॥
- अनिता चतुर्वेदी
2 महीने पहले
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