आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

बादरौ — विरहिणी की आस

                
                                                         
                            घन घोर घिरे गगन में,
                                                                 
                            
दामिनि दमकि उठी चहुँ ओर।
श्याम घटा की छाँह निहारी,
नैनन जागी पिय की डोर॥

काहे रे बादर! इत-उत डोलत,
काहे गरजत बारंबार?
जाइ कहो मोरे साँवरे से—
बिरहन बैठी तजि सिंगार॥

अँखियन अंजन सूख गयो है,
अधरन रूठी मधुर मुसकान।
सेज सजी, पर सेज विरानी,
पिय बिन सूना सारा धाम॥

कुंतल-जाल-सी घनघटा,
छाई नील गगन के छोर।
दामिनि-सी पिय-सुधि चमकै,
हिय में उठै प्रेम की हिलोर॥

मोर-पपीहा बोलत बन में,
कोयल कूकत आम्र-कुंज।
बूँदन की झंकार सुनत ही,
धड़क उठत विरही उर-कुंज॥

कहती—“बादर! दूत बनो तुम,
मेरी अरज सुनायो जाय।
कहियो श्याम बिना यह सावन,
आँखिन नीर बहायो जाय॥”

“कहियो—बिन दर्शन मोहन के,
फीकी लागै फाग-फुहार।
बादर बरसे लाख घड़ी पर,
सूना मन को कौन उबार?”

घन गरजा, नभ दामिनि हँसी,
बरसी बूँदन की झड़ी।
बिरहन के नयना भी बरसे,
याद पिया की और गहरी॥

श्याम घटा जब छाई अँगना,
लगी उसे श्यामल छवि भाय।
बादर में ही पिय को देखा,
बादर में ही पिय मुसकाय॥

बादर! तू धन्य भयो रे,
तूने विरह बढ़ायो आज।
पिय की सुधि जो देत हिय में,
वह भी तो है प्रेम-सुहाग॥
- अनिता चतुर्वेदी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर