अर्पण
नीरव निशा के आँचल में,
जब सो जाता संसार,
किसके चरणों में रख दूँ मैं
मन के स्वप्न अपार?
मेरे उर की मूक व्यथा में
किसकी छवि मुस्काती है,
किस अनजाने प्रिय के हित
यह आत्मा दीप जलाती है?
मैंने अपने भाव-सुमन को
अश्रु-जल से सींचा है,
अंतर के एकांत कुंज में
तेरी छवि को सहेजा है।
जो कुछ मेरा कहती थी मैं,
वह भी कहाँ हमारा था,
श्वास-श्वास में बसा हुआ
किसी और का उजियारा था।
ले लो मेरे स्वप्न सलोने,
ले लो मन का मधुमास,
ले लो मेरी मौन साधना,
ले लो जीवन की हर साँस।
नहीं चाहती प्रतिदान कोई,
न यश का मधुरिम गान,
तेरी राहों में बिखर सकूँ,
बस इतना हो वरदान।
जैसे सरिता सागर-हित
अपना अस्तित्व बहाती है,
जैसे धरती मौन रहकर
नवजीवन को उपजाती है।
वैसे ही यह जीवन मेरा
प्रेम-सुधा बनकर बह जाए,
मेरे होने की गंध कहीं
किसी के मन में रह जाए।
जब संध्या की अंतिम वेला
जीवन-द्वार पर आएगी,
मेरी बुझती हुई शिखा भी
किसी दीप में समाएगी।
तब समझूँगी सफल हुआ है
मेरा यह लघु जीवन,
स्वयं को देकर पा लेना ही
है अर्पण का सच्चा साधन।
मैं फूल नहीं, उसकी सुगंध बनूँ,
मैं दीप नहीं, उसकी ज्योति बनूँ,
मिट जाए मेरा ‘मैं’ इस जग में,
मैं प्रेम की अमर अभिव्यक्ति बनूँ।
— अनिता चतुर्वेदी ‘मनस्वरा’