अब कभी बेनूर न होंगे हमारे गुलदस्ते
हमने इनमें लगा रखे हैं फूल कागज के
इनमें दुश्वारियों के कांटे होने लाज़िम हैं
गुलाब खिलने लगे हैं शजर पे उल्फ़त के
जिधर मिलेगा प्यार हम तो उधर जाएंगे
कारवां मुड़ने लगे हैं और कहीं चाहत के
तोड़े जाएंगे कभी ये भी हमें मालूम था
इन दरख्तों पे लगे फल रसीले नफरत के
शिकवा न कर सकी जिंदगी कभी मुझसे
हमने समझाया था हर बार बड़ी शिद्दत से