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जी नहीं होता है कुछ कहने को अब

Anil Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जी नहीं होता है कुछ कहने को अब
        
                                                    
                            
सोचता अक्सर हूं चुप रहने को अब
मर रहा हर शख्स जीने के लिए
जी रहा शायद कोई मरने को अब
मुल्तवी रखा था आखिर के लिए
सोचता हूं सब वही करने को अब
शोर से मेरे, कोई सोई नदी
हो गई तैयार है ,बहने को अब
सीख पाया मैं कभी रोना नहीं
रह गया है कुछ नहीं हंसने को अब
बारिशों ने जब गिरा छप्पर दिया
जा रही दीवार भी ढहने को अब
शहर को फिर से बसाना है हमें
बस्तियां तैयार हों मिटने को अब
मेरे लफ्जों के जहां छींटें पड़े
जा रहा है दिल में कुछ जलने को अब
2 महीने पहले
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