विज्ञापन

सोच रहा हूं मैं फागुन को

Anil Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ढूंढ रहा हूं खुद में खुद को
        
                                                    
                            
कुछ हैरत से देख न मुझको
पूस की रातों की ठिठुरन में
सोच रहा हूं मैं फागुन को
मुझको मंजिल दिखने तो दे
फिर आवाज लगाऊँ तुझको
रहने दे कुछ देर अकेला
छेड़ न दीवाने गुमसुम को
इस मंजिल की राह कठिन है
लौट के अब जाने दो उनको
जंग के कर्कश कोलाहल में
सुन जीवन की इस रुनझुन को
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all