ढूंढ रहा हूं खुद में खुद को
कुछ हैरत से देख न मुझको
पूस की रातों की ठिठुरन में
सोच रहा हूं मैं फागुन को
मुझको मंजिल दिखने तो दे
फिर आवाज लगाऊँ तुझको
रहने दे कुछ देर अकेला
छेड़ न दीवाने गुमसुम को
इस मंजिल की राह कठिन है
लौट के अब जाने दो उनको
जंग के कर्कश कोलाहल में
सुन जीवन की इस रुनझुन को
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