विज्ञापन

धूप का टुकड़ा

Anil Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इस कदर मशगूल हुए राह के हालातों में
        
                                                    
                            
मंजिलों से किए वादे रहे सवालातों में
वादे वादे न रहे ,कसमें कसमें न रहीं
रंग उतरने भी लगे,पहली बरसातों में
निकले थे मिलने को, हम भी फरिश्तों से
पड़ता रहा पाला, खालिस कमजातों से
धूप के भी टुकड़े को आज तक तरसते हैं
हम निकल नहीं पाए,सर्द काली रातों से
अब तक महरूम रहे,तेरी मुलाकातों से
बात कहाँ बनती है,सिर्फ खाली बातों से
जलते आदमी की उम्मीद ये गुनाह नहीं
खुशियां भी बरसेंगी,कभी कायनाताें से
सही और गलत की दीवार ढह नहीं जाए
खेलना नहीं अच्छा, आपके जज्बातों से
3 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile