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धूप का टुकड़ा

                
                                                         
                            इस कदर मशगूल हुए राह के हालातों में
                                                                 
                            
मंजिलों से किए वादे रहे सवालातों में
वादे वादे न रहे ,कसमें कसमें न रहीं
रंग उतरने भी लगे,पहली बरसातों में
निकले थे मिलने को, हम भी फरिश्तों से
पड़ता रहा पाला, खालिस कमजातों से
धूप के भी टुकड़े को आज तक तरसते हैं
हम निकल नहीं पाए,सर्द काली रातों से
अब तक महरूम रहे,तेरी मुलाकातों से
बात कहाँ बनती है,सिर्फ खाली बातों से
जलते आदमी की उम्मीद ये गुनाह नहीं
खुशियां भी बरसेंगी,कभी कायनाताें से
सही और गलत की दीवार ढह नहीं जाए
खेलना नहीं अच्छा, आपके जज्बातों से
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3 महीने पहले

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