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अनबूझे रहस्य को मन की परतों को

Anil Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वो खूबसूरत है बेशक
        
                                                    
                            
मगर उसकी सुंदरता
नहीं है किसी एक आइने की चाहत
उसे ज़र्रे जर्रे में बिखेरनी है अपनी किरणे
जो उसे बांधने की कोशिश करेगा
पछताएगा,रोयेगा अगर उससे जोड़ेगा खुद को
मचलती हवा कब कैद में रह सकती है
मैं जनता हूं उसकी फितरतें
इसलिए मैं खुश होता हूं उसे
रोशनी में जगमगाते देखकर
उसका जंगलीपन हैरान नहीं करता है मुझे, क्योंकि मैं खुद भी ऐसा ही हूं शायद
और कभी कोशिश भी नहीं की
उसका पीछा करने की
दूर से देखता रहा, संसार के इस
अनबूझे रहस्य को मन की परतों को
पढ़ता रहा
और कई बार कर दिया अनदेखा
नहीं कर पाता है स्वीकार दिल
चलती आ रही रूढ़ियों को जरा भी
इस खेल में मैं दृष्टा ही रहा
नजारे बदलते गए
उसने दुनिया को कर दिया था पागल सा
एहसास था उसे अपने जादू का
सिर्फ मै अप्रभावित था,उसके तिलस्म से
यह चोट था उसके गुरूर पर
उसने अपना जादू बिखेर दिया मुझपर
रुककर,कुछ झुककर मै फिर भी शांत रहा
और उसको याद दिलाया उसका जंगलीपन,अब शायद जिसका अफसोस था उसे
फिर भी मैं चला आया उस जादू से दूर
सम्मोहित होने से पहले
खुद को उसकी यादों में छोड़कर
फूल चाहता है उपवन में इठलाना
नीयत है उसकी,किसी
गुलदान का हो जाना
एक घंटा पहले
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