आजादी के पंछी जाल में फँसकर कैद हुएजब पिंजरे में
कभी चहकना छोड़ न पाए जान हो चाहे खतरे में
मरते मरते भी दीवाने कब अफसोस किया करते हैं
एक शहादत का भी नशा है खून के कतरे कतरे में
जो जीते जी मर जाने की ठान ही लेते हैं अक्सर
रौशन कर जाते हैं उजाले इस वतन के जर्रे जर्रे में
जिसकी कीमत कम होती है यहां वहां बिकती रहती
उम्दा चीजों की ही हिफाजत की जाती है पहरे में
उथले पानी की अक्सर ही मिट्टी बदबू देती है
दरिया की गहराई में सोने को हम डूबेंगे गहरे में