खुद को मैं समझा न सका फिर
इस दिल को बहला न सका फिर
हम थे तुम थे ,और जमाना
एक हकीकत ,एक अफसाना
ऐसा मोड़ सफर में आया
बच जाना या जान से जाना
तुमसे होकर दूर भी आखिर
किसी का भी कहला न सका फिर
याद है धुँधली पर कायम है
पत्थर पर गिरती शबनम है
दर्द है ज्यादा चैन ही कम है
जीवन में वापस आकर भी
कोई कमी है कोई सितम है
मैं बेहतर हूं ,पर बदतर हूं
इस सच को झुठला न सका फिर
आग लगी जो बुझ ना पाई
यूं तो किस्मत भी पछताई
बहती है जब जब पुरवाई
वो ग़मगीन हुई जाती है
छूकर ज़ख्मों की गहराई
जिनको मैं सहला न सका फिर