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वो दिन बचपन के

Anil Meena

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            'वो दिन बचपन के'
        
                                                    
                            
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‘आ रहें हैं,याद,
वो दिन बचपन के।
बंधन दस्तूरों का निभाना,
कितना,कितना मुश्किल होता है।
जब बन्धन की डोर,
खिंचती है, चारों ओर,
डर लगता है,
टूटने का,
हर घड़ी सताता है,
आकर्षण में,विकर्षण का भाव,
कर्त्तव्यनिष्ठ पथ में,
यह कैसा अभाव,
मान का,
मर्यादा का,
ममता का,
मानवता का,
हर तरफ उजाले में,
अन्धकार को उगलती,परछाईयों में,
आ रहें हैं,
याद वो दिन बचपन के।
जिसमें था,स्नेह-प्रेम का,
खट्टा-मिठा अपनत्व भरा,
बन्धन ही बन्धन।
बड़े हुए तब,
हालात बदल गये सब,
बन्धन टूटने लगे,
बंधन जुड़ने लगे,
बचपन,जवानी से होता हुआ,
बुढ़ापे मे ढलने लगा तब,
सूरज का उदय होना,बचपन था,
सूरज का चरम पर होना,जवानी थी,
सूरज का पश्चिम मे होना,बुढ़ापा था,
मचल रहे थे,तड़फ रहे थे,
पश्चिम की लालिमा में,
आ रहें हैं,याद,
वो दिन,सुबह के,
वो दिन,दोपहर के,
कभी नंगे पांव,
कभी धूप तो कभी छांव,
सारे दिन-रात उछल-कूद,
‘मां’ के आंचल में,
कभी उजला मुख,
’पिता' की गोद में,
ना फिक्र,
ना जिक्र दस्तूरों का,
बस,
अपनी जिद,
अपनी हद,
अपना आंगन,अपनी उलझन,
आ रहे हैं, याद वो दिन....
 
16 घंटे पहले
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