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तेरी स्मृति

Anil Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            साँझ उतर आई आँगन में,
        
                                                    
                            
नील गगन पर रंग बिखेरे,
खिड़की से आती मंद पवन ने
छेड़ दिए कुछ गीत अधूरे।
एक पुरानी धुन के संग ही
मन जाने क्यों दूर चला,
बीते क्षण की धुँधली राहों पर
फिर तेरा अहसास मिला।।

चाँद खड़ा था मौन छतों पर,
रात बुन रही थी ताने-बाने,
तारों की झिलमिल में जैसे
खुलते हों बीते अफसाने।
पलकों पर ठहरी नमी ने
मन की भाषा रच डाली,
शब्द बिना ही जाने कितनी
बात हृदय ने कह डाली।।

सूने पथ पर पत्ते उड़ते,
जैसे कोई संदेशा लाएँ,
दूर कहीं मंदिर की घंटी
मन के बंद कपाट जगाएँ।
चलते-चलते लगा अचानक
समय यहीं पर रुक जाएगा,
जिसे भुलाने निकला था मैं,
वही अधिक याद आएगा।।

ऋतुएँ बदलीं, रंग बदलते,
फूल खिले और फूल झरे,
धूप कभी पलकों पर ठहरी,
कभी बादल आकर घिरे।
फिर भी मन की एक किताब में
एक पृष्ठ अनछुआ रहा,
जिस पर मौसम लाख बदलें,
तेरा नाम लिखा ही रहा।।

अब तेरी स्मृति बोझ नहीं है,
यह मन की मधुर धरोहर है,
दूर कहीं होकर भी जैसे
तू मेरे भीतर ही अक्सर है।
जीवन अपनी गति से चलता,
रातें जातीं,दिन आते हैं,
पर कुछ रिश्ते समय से आगे,
साँसों में जीवित रह जाते हैं ।।

- पंडित अनिल
एक महीने पहले
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